पाक से बात भी करें और उसे ताकत भी दिखाएं

यह ठीक है कि पाकिस्तान की फौज अपने अंदरुनी आतंकवाद पर ही पूरी तरह से काबू नहीं कर पाती है। भारत में जितने लोग आतंकवाद के शिकार होते हैं, उससे कई गुना ज्यादा लोग पाकिस्तान में मरते हैं।

New Delhi, Dec 02 : पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की बातों पर हमारी सरकार भरोसा करे या न करे, यह सवाल आज सबसे बड़ा है। इमरान ने शपथ लेते वक्त और नानक बरामदे का उदघाटन करते वक्त, दोनों बार भारत से संबंधों का नया अध्याय खोलने की अपील की है। इससे भी ज्यादा साफगोई से वे हमोर पत्रकारों से बोले है। उन्होंने दो बातें कही हैं, जिन पर हमें ध्यान देना चाहिए। एक तो यह कि मुंबई हमला-जैसी आतंकवादी घटनाओं के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। वे घटनाएं पुरानी हो गई हैं। दूसरा, भारत के सांथ संबंधों को सुधारने के मामले में पाकिस्तान की फौज उनके साथ है। जर्मनी और फ्रांस- जैसे दो राष्ट्र, जिन्होंने युद्ध लड़कर खून की नदियां बहाई, यदि वे आज मित्र-देश बन गए हैं तो भारत और पाकिस्तान के रिश्ते क्यों नहीं सुधर सकते ? भारत और पाकिस्तान, दोनों ही परमाणुसंपन्न राष्ट्र हैं। उनके बीच युद्ध की बात सोचना ही मूर्खता है।

यह सब कहते-कहते इमरान कश्मीर को भी बीच में ले आए। उन्होंने कहा कि दुनिया चांद पर पहुंच गई है और हम कश्मीर को नहीं सुलझा पाए। बस, यही तो एक समस्या है, दोनों के बीच ! हमारे नेताओं और पत्रकारों का सवाल यह है कि इमरान को यहां कश्मीर को घसीटकर लाने की जरुरत ही क्या थी ? क्या पाकिस्तान का कोई नेता कश्मीर की माला जपे बिना रह सकता है ? नानक बरामदे का शिलान्यास हमारे और उनके मंत्रियों के बिना भी हो सकता था। उसका शिलान्यास हो और उस समय भारत-पाक संबंधों का जिक्र न हो, यह कैसे हो सकता है और उस वक्त कश्मीर का जिक्र आए बिना कैसे रहेगा ? वह तो पाकिस्तान की दुखती रग है।

इमरान के भाषणों का भारत सरकार ने कोई खास स्वागत नहीं किया बल्कि उल्टा ही हुआ। भारत ने दक्षेस सम्मेलन के बहिष्कार की घोषणा कर दी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कह दिया कि जब तक आतंकवाद नहीं रुकेगा, भारत कोई बात नहीं करेगा। भारत के बहिष्कार के कारण पिछला दक्षेस सम्मेलन भी इस्लामाबाद में होने से रह गया था। सुषमा का इतना कड़ा रवैया स्वाभाविक है, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री, दोनों पिछले चार साल में पाकिस्तान जा चुके हैं लेकिन इसके बावजूद एक के बाद एक आतंकवाद की घटनाएं भारत में होती रही हैं। उन घटनाओं के दौरान जो लोग और हथियार पकड़े गए हैं, उनसे पाकिस्तान का संबंध स्वयंसिद्ध है। यह ठीक है कि इमरान खान आतंकवाद का समर्थन नहीं करते हैं लेकिन वे ऐसा कुछ करके क्यों नहीं दिखाते, जिससे आतंकवादी घटनाओं पर रोक लग सके। कम से कम छह महिने की रोक लगाकर दिखाएं। अपने अंदरुनी आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की फौज ने जितनी कठोरता दिखाई है, वह भारत-विरोधी आतंकवाद के खिलाफ भी करके क्यों नहीं दिखाती ?

यह ठीक है कि पाकिस्तान की फौज अपने अंदरुनी आतंकवाद पर ही पूरी तरह से काबू नहीं कर पाती है। भारत में जितने लोग आतंकवाद के शिकार होते हैं, उससे कई गुना ज्यादा लोग पाकिस्तान में मरते हैं। भारत में मुख्यतया कश्मीरी आतंकवाद है लेकिन पाकिस्तान में सिंध, बलूच, पठान, पंजाबी और अफगान आतंकवाद उसे तंग किए रहते हैं। पाकिस्तानी राष्ट्र का चरित्र ही कुछ ऐसा बन गया है कि उसके लोगों का कोई भी असंतोष चुटकी बजाते ही आतंकवादी रुप धारण कर लेता है। इसीलिए हमारी यह शर्त मुझे जरा अव्यावहारिक लगती है कि हम पाकिस्तान से बात तभी करेंगे, जब आतंकवाद पर वह रोक लगा देगा।

और जहां तक दुश्मन से बात करने का सवाल है, पांडवों का दुर्योधन से बड़ा दुश्मन कौन था ? लेकिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक महाभारत का युद्ध चलता था और उसके बाद पांडवों और कौरवों में संवाद होता था। क्या हमारे नेता भगवान कृष्ण और भीष्म पितामह से भी ज्यादा समझदार है ? क्या उन्हें पता नहीं कि जब माओ त्से तुंग का चीन और अमेरिका एक-दूसरे के विरुद्ध विनाशकारी युद्ध की तैयारी में जुट जुए थे, उस दौरान 16 साल तक दोनों देशों के राजदूत पोलेंड में बैठकर रोज संवाद करते थे ? मैं तो समझता हूं कि किसी भी जिम्मेदार प्रधानमंत्री को अपनी बात और लात दोनों हमेशा बुलंद रखनी चाहिए। या तो दोनों साथ-साथ चलें या जब जिसकी जरुरत हो, वह चले।

जहां तक कश्मीर का सवाल है, पाकिस्तान के पहले यह सवाल भारत को उठाना चाहिए, क्योंकि हमारे आधे कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा है। पाकिस्तान की एक इंच जमीन पर भी हमारा कब्जा नहीं है। पता नहीं क्यों, भारत की सरकारें इस मुद्दे पर दब्बू बन रहती हैं। पाकिस्तान की अकादमिक संस्थाओं में होनेवाले मेरे भाषणों में मैंने यह सवाल लगभग हर बार उठाया है। पाकिस्तान के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों से जब मैं उनके ‘आजाद कश्मीर’ पर सवाल करता हूं तो उनके बोलती बंद हो जाती है। मैं उनसे पूछता हूं कि आप कश्मीर में जनमत-संग्रह कराना चाहते हैं तो क्या आप कश्मीर को तीसरा विकल्प याने आजाद राष्ट्र बने का विकल्प देंगे ? यह सवाल उनकी जड़ों को हिलाकर रख देता है। इसीलिए मैं अपने नेताओं को कहता रहा हूं कि मुशर्रफ, बेनजीर या नवाज या इमरान जब कश्मीर का सवाल उठाएं तो उन्हें आप उठाने क्यों नहीं देते ? दिक्कत यह है कि हमारे नेताओं को भी कश्मीर संबंधी संयुक्तराष्ट्र संघ के मूल प्रस्ताव का पता नहीं है।

नानक बरामदे के शिलान्यास के मौके पर पंजाब के मंत्री नवजोतसिंह सिद्धू को लेकर भी फिजूल की बहस चल रही है। हमारे टीवी चैनल अपनी टीआरपी बनाने के लिए कोई भी ऊटपटांग बहस छेड़ देते हैं। जिस सिद्धू को भाजपा राजनीति में लाई और जो 10-12 साल तक भाजपा का जन-प्रतिनिधि रहा, उसे देशद्राही सिर्फ इसलिए बताया जा रहा था कि वह पाक सेनापति क़मर बाजवा या किसी खालिस्तानी सिख से मिल लिया था। यदि ऐसा है तो जिन्ना के घर दौड़-छौड़कर जानेवाले गांधीजी और अयूब खान से ताशकंद में हाथ मिलानेवाले लालबहादुर शास्त्रीजी को आप क्या कहेंगे ? हमारा मीडिया पता नहीं क्यों किसी कोने में पल रहे खालिस्तानी को हीरो बनाने पर तुला हुआ है। इमरान और सिद्धू ने एक-दूसरे की तारीफ के पुल बांधे, यह भी स्वाभाविक ही था।

यदि भारत के गुप्तचर विभाग और विदेश मंत्रालय को यह शक है कि नानक बरामदे का इस्तेमाल पाकिस्तान जासूसी और खालिस्तानी आंदोलन को बढ़ाने में इस्तेमाल करेगा तो उसका यह शक ठीक भी हो सकता है लेकिन यदि उसे ऐसा पक्का विश्वास है तो सरकार ने फिर इस प्रस्ताव को मंत्रिमंडल से पारित क्यों करवाया ? उसने इस शिलान्यास कार्यक्रम में अपने दो केन्द्रीय मंत्री क्यों भिजवाए ? जब उसने यह पहल कर ही दी है तो उसे जरा धैर्य से काम लेना चाहिए।
जहां तक पाकिस्तान से बात शुरु करने का सवाल है, आजकल भारत में अगले चुनाव का मौसम शुरु हो चुका है। भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की यह खूबी है कि उनके बिगाड़ से दोनों तरफ के नेताओं का फायदा होता है। चुनाव में वोटों की बरसात होती है। चुनाव में वोट और नोट ही ब्रह्म होते हैं। बाकी सब मिथ्या होता है। इसीलिए पाक के प्रति भारत का कठोर रवैया गलत नहीं है। इमरान, नवाज और ज़रदारी इस मजबूरी को खूब समझते हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)