‘मोदी पर अब नई मुसीबत’

जब अंबानी को बिचैलिया बनाने से सरकार को इतना फायदा होगा तो वह अंबानी को फायदा क्यों नहीं पहुंचाना चाहेगी ? अंबानी की टेलिकाॅम कं. ‘रिलायंस एटलांटिक फ्लेग फ्रांस’ पर फ्रांसीसी सरकार ने 1100 करोड़ रु. का टैक्स कई वर्षों से ठोक रखा था।

New Delhi, Apr 15 : इधर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए रुस और यूएई के सर्वोच्च सम्मानों की घोषणा हो रही है और उधर पेरिस के प्रसिद्ध अखबार ‘ल मोंद’ में हुआ रहस्योदघाटन मोदी की छवि को धूल-धूसरित कर रहा है। चुनाव के दौरान इन खबरों के आने का विशेष महत्व है। भारत के किसी भी प्रधानमंत्री को विदेशों के इतने और बड़े सम्मान पहले कभी नहीं मिले लेकिन यह भी सच है कि 30 हजार करोड़ रु. जितने-बड़े घोटाले से आज तक किसी भी प्रधानमंत्री का नाम नहीं जुड़ा।

फ्रांसीसी सरकार या वहां के किसी अखबार ने यह दावा नहीं किया है कि मोदी ने रफाल-सौदे में अरबों रु. खाए हैं लेकिन कांग्रेस के नेता राहुल गांधी उन्हें ‘चोर-चोर’ कहने से बाज नहीं आ रहे हैं। उसका अर्थ यह है कि अनिल अंबानी को बिचौलिया बनाकर रफाल को दिया जानेवाला सरकारी पैसा वापस मोदी को मिल जाएगा, जिसका इस्तेमाल भाजपा के लिए होगा। जब अंबानी को बिचैलिया बनाने से सरकार को इतना फायदा होगा तो वह अंबानी को फायदा क्यों नहीं पहुंचाना चाहेगी ?

अंबानी की टेलिकाॅम कं. ‘रिलायंस एटलांटिक फ्लेग फ्रांस’ पर फ्रांसीसी सरकार ने 1100 करोड़ रु. का टैक्स कई वर्षों से ठोक रखा था। लेकिन अप्रैल 2015 में जैसे ही रफाल-सौदा हुआ, उसके छह माह के अंदर ही फ्रांसीसी सरकार ने सिर्फ 56 करोड़ रु. में मामला निपटा दिया। क्यों निपटा दिया, इसे आसानी से समझा जा सकता है।

अब फ्रांसीसी सरकार और भारत सरकार ने कहा है कि यह शुद्ध संयोग है। इसका रफाल-सौदे से कुछ लेना-देना नहीं है। उनका यह मानना ठीक हो सकता है। यदि यह ठीक है तो इसे तीन साल पहले ही उजागर क्यों नहीं कर दिया गया ? वैसा उस समय करते तो शायद रफाल-सौदे की दलाली भी उसी समय उजागर हो जाती। लेकिन अब राहुल गांधी का आरोप है कि इस मामले में नरेंद्र मोदी को फ्रांस और अंबानी के बीच दलाल बना दिया है। सारा मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है। यदि 23 मई के पहले अदालत ने कोई उलटी राय जाहिर कर दी तो मोदी के लिए मुसीबत का नया पहाड़ टूट पड़ सकता है। वैसे 2019 के चुनाव में आम मतदाता पर इस मामले का कितना असर है, कुछ कहना मुश्किल है। ऐसा लगता है कि इस चुनाव में स्थानीय, प्रांतीय और जातिवादी मुद्दों का असर कहीं ज्यादा रहेगा।
(वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)