Opinion – वह अदालती फैसला जो इमरजंसी का कारण बना

संध्या को गुजरात विधान सभा चुनाव के नतीजे आने लगे।वहां जनता मोर्चा कांग्रेस से काफी आगे हैं। लगता है कि कांग्रेस की हार होगी। कांग्रेस की क्या, हार प्रधान मंत्री की होगी। ’

New Delhi, Jun 12 : 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के लोक सभा चुनाव को खारिज कर दिया था।यही फैसला देश में आपातकाल लगाने का कारण बना।
12 जून को बिशन टंडन ने अपनी डायरी में जो कुछ लिखा, उससे भी यह बात साफ थी कि इंदिरा गांधी ने प्रधान मंत्री की अपनी कुर्सी बचाने के लिए ही देश पर आपात काल थोेपा था।टंडन जी तब प्रधान मंत्री सचिवालय में संयुक्त सचिव थे।

‘आपातकाल एक डायरी’ नामक अपनी पुस्तक में 12 जून 1975 को श्री टंडन लिखते हैं कि यदि प्रधान मंत्री को समझ सका हूं तो वे और चाहे कुछ करें ,पर कुर्सी कभी नहीं छोड़ेंगी। अपने को सत्ता में रखने के लिए वे गलत से गलत काम करने में भी नहीं हिचकिचाएंगी।’
उन ऐतिहासिक घडि़यों का वर्णन पढि़ए, ‘सुबह -सुबह समाचार मिला कि डी.पी.@सोविय यूनियन में भारत के राजदूत@ की मत्यु हो गई।कार्यालय पहुंचते ही बी. आर..मेरे कमरे में आ गया।काम करने का विशेष मन नहीं था।प्रधान मंत्री कार्यालय नहीं आई थीं।इलाहाबाद से समाचार आने की प्रतीक्षा थी। दस बजकर पांच मिनट पर फोन आया कि निर्णय प्रधान मंत्री के प्रतिकूल हुआ है।मैंने टेलिप्रिटर पर स्वयं पढ़ा कि जस्टिस जग मोहन लाल सिंहा ने प्रधान मंत्री के लोक सभा के लिए निर्वाचन को रद कर दिया है और भ्रष्टाचार के आरोप को ठीक मान कर उन्हें छह साल तक निर्वाचन के अयोग्य घोषित कर दिया है। मैं प्रो.धर के कमरे की ओर बढ़ा।वे जल्द ही प्रधान मंत्री निवास जाना चाहते थे।मैं शारदा के कमरे में चला गया।’

‘लंच तक शेषन और शारदा भी प्रधान मंत्री निवास से आ गये थे। शेषन ने बताया कि निर्णय आने के बाद प्रधान मंत्री निवास पर मंत्री गण आना शुरू हो गये। कुछ देर प्रधान मंत्री ने गोखले,सिद्धार्थ व पालकी वाला से बातचीत की। साढ़े दस बजे ही प्रधान मंत्री,संजय और धवन की गुपचुप बातचीत के बाद धवन ने दिल्ली में कई लोगों को फोन किया कि प्रधान मंत्री के समर्थन में शीघ्र रैली आयोजित की जाए।उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री को भी फोन हुआ कि वे भी सीमावत्र्ती जिलों से रैली के लिए लोगों को भेजें और लखनउ में भी रैली कराएं।बंसी लाल ने प्रधान मंत्री निवास से भी आदेश दिए कि उनके राज्य के सभी डिप्टी कमिश्नर इन रैलियों को करने में पूरी मदद करें।थोड़ी देर में बहुत जगह फोन खटखटाए गये कि जन समर्थन दिखाने के लिए शीघ्र प्रदर्शन होने चाहिए।दिल्ली का पूरा प्रशासनिक तंत्र इस काम में जुट गया और रैलियां प्रारंभ हो गईं।’

लच तक यह भी निर्णय प्रधान मंत्री ने कर लिया था कि वे प्रधान मंत्री पद पर फिलहाल बनी रहेंगी और सुप्रीम कोर्ट मंे अपील करेंगी। इसकी सूचना शारदा ने पी.टी.आई.और यू.एन.आई. को दी। प्रधान मंत्री खुद प्रेस से बात नहीं कर रही हैं। हमारे कार्यालय में जी.आर.,बी.आर.शारदा और शेषन की यही राय है कि प्रधान मंत्री को इस्तीफा नहीं देना चाहिए। पर बी.आर.का यह भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट से पूर्ण स्टे नहीं मिले तो फिर पी.एम.को इस्तीफा दे देना चाहिए।प्रो.धर की क्या राय है,मुझे नहीं मालूम।

संध्या को गुजरात विधान सभा चुनाव के नतीजे आने लगे।वहां जनता मोर्चा कांग्रेस से काफी आगे हैं। लगता है कि कांग्रेस की हार होगी। कांग्रेस की क्या, हार प्रधान मंत्री की होगी। ’
याद रहे कि गुजरात में कांग्रेस की अंततः हार हो गई और प्रतिपक्ष की सरकार बन गई।यानी 12 जून 1975 को प्रधान मंत्री को तीन -तीन झटके लगे। पारिवारिक विश्वासी डी.पी.धर का निधन,इलाहाबाद का निर्णय और गुजरात में पराजय।
आपातकाल की भूमिका बन गई।दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिन चुनावी अपराधों के तहत इंदिरा गांधी के चुनाव को खारिज किया था,उस फैसले को उलटने के लिए कानून में महत्वपूर्ण संशोधन की जरूरत थी।वह संशोधन सामान्य दिनों में संभव नहीं था।क्योंकि तब जेपी के आंदोलन के कारण देश का राजनीतिक माहौल काफी गर्म था।इसलिए 25 जून की रात में आपातकाल लगाकर अन्य अंगों के साथ साथ न्यायपालिका को भी आतंकित कर दिया गया।संबंधित चुनाव कानून में अगस्त में इस तरह संशोधन कर दिया गया ताकि इलाहाबाद हाईकोट्र का जजमेंट निष्प्रभावी हो जाए।यही हुआ भी ।नवंबर 1975 में संशोधित कानून के मददेनजर सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद कोट के जजमेंट को रद कर दिया।कोई सत्ताकामी नेता किस तरह अपनी गददी बचाने के लिए तानाशाह बन कर कानून को ही बदल देता है और किस तरह लोक तंत्र को स्थगित कर देता है,इंदिरा गांधी उसकी मिशालरहीं। 1975 का जून महीना इस देश में शायद हमेशा ही याद रखा जाएगा।इसे इसलिए भी याद रखना जरूरी है ताकि इसकी कभी पुनरावति नहीं हो।

(वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)