Opinion: ‘बाघ करे म्याऊँ’, उद्धव अपने को सेक्युलर दिखा तो गये, पर अभी दिल से बनने में देर है

उद्धव ने गतमाह चुनाव के मतगणना के तुरंत बाद घोषणा की थी कि सपरिवार वे रामलला के दर्शन करने (24 नवम्बर) जायेंगे, मगर नहीं गए|

New Delhi, Dec 02: गंगा जमुनी लोग दंग रह गये| हिंदुत्व वाले तंग हो गए| कारण यही कि उद्धव बालासाहब ठाकरे साठ पार करते ही, सेक्युलर हो गए| हालांकि उनके पिता बाल केशव ठाकरे हिन्दू ह्रदय सम्राट कहलाते थे| मुसलमानों को वे मताधिकार से वंचित करना चाहते थे| (सोमवंशी राठौर राजपूत, सांसद संजय राउत ने शिवसेना मुखपत्र “सामना” 12 अप्रैल, फिर नवम्बर 2016 में, दो बार इसे लिखा था|) उद्धव ने बाम्बे हाई कोर्ट (22 अप्रैल 2018: न्यायमूर्ति गौतम पटेल) में खण्डन किया था कि उनके पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ थे| उनके अग्रज जयदेव बालासाहब ठाकरे ने पिता की वसीयत को चुनौती दी थी| मानसिक परीक्षण की माँग की थी|

एक बार जीवीजी कृष्णमूर्ति, निर्वाचन आयुक्त, ने बाल ठाकरे से पूछा था कि वे शिव सेना अध्यक्ष कब निर्वाचित हुए थे ? उनका जवाब था, “हमारे संगठन में चुनाव नहीं होता है| मतदान से गिरोहबंदी पनपती है|” सोनिया गाँधी-टाइप नामांकन, शायद| अब अगर सेक्युलर शरद पवार की मदद से धर्म-प्रधान शिव सेना के अध्यक्ष उद्धव मुख्य मंत्री बन गये, तो एक रुचिकर तथ्य को याद करना होगा| इस सारे माजरे की शिल्पकार सुप्रिया सुले शरद पवार की पुत्री हैं| उनके जेठ हैं उद्धव ठाकरे| अर्थात शरद पवार के पाहुना (जमाईराजा) सदानंद सुले जी बाल ठाकरे के सगे भगना (भांजे) हैं| उनकी भगिनी सुधा सुले के समधी ही पवार हैं| मामला सब घरेलू है| इसीलिय सदन के भीतर अथवा बाहर शरद पवार ने दामाद राबर्ट वाड्रा जी पर कभी टीका टिप्पणी नहीं की|

उद्धव ठाकरे के पंथनिरपेक्ष बनने के पीछे गाथा लम्बी है | अपनी तरुणाई (दिसम्बर 1992) में उन्होंने बाबरी ढांचा ध्वस्त करने वालों को शिवसैनिक माना था| बाल ठाकरे ने तो विध्वंस को शौर्य-कृति बताया था| तभी बाबरी ढांचा गिराये जाने के अंजाम में मुंबई जलाई गई थी| आरोप था दाउद इब्राहिम पर| इस मशहूर बम्बइया से पवार का स्निग्ध सामीप्य बताया जाता है| उद्धव ने गतमाह चुनाव के मतगणना के तुरंत बाद घोषणा की थी कि सपरिवार वे रामलला के दर्शन करने (24 नवम्बर) जायेंगे, मगर नहीं गए| अजमेर शरीफ को अलबत्ता चादर अवश्य भेज दिया | उद्धव अपने को सेक्युलर दिखा तो गये, पर अभी दिल से बनने में देर है| कलमा के बाद हालाँकि प्याज ज्यादा खाने का रिवाज है| अर्थात् उद्धव का शिवसेना वाला शेर अपनी केसरिया लकीरें मिटाने में वक्त लेगा| बाघ से बघर्रा बनने की प्रक्रिया में टाइम चाहिए| उसकी गर्जना यद्यपि हिन्दुओं के पक्ष में बंद हो गई है| उसके म्याऊँ करने में क्रमशः तेजी आ रही है|

अब गौर कर लें महाराष्ट्र विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पर पड़े वोटों के विश्लेषण पर| अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के विधायक कट्टर इस्लामिस्ट अबू आसिम काजमी और उनके सहयोगी ने शिवसेना के पक्ष में वोट दिया| ओवैसी की मुस्लिम मजलिसे इत्तेहाद के विधायकों ने शिवसेना का विरोध नहीं किया| मार्क्सवादी कम्युनिस्ट सदस्य कामरेड विनोद निकोले द्वारा समर्थन न देने का कारण था कि नेक और प्रतिष्ठित कम्युनिस्ट श्रमिक नेता कृष्ण देसाई की हत्या शिव सैनिकों ने की थी| हालांकि ऐसी ही धमकी शिवसेना ने कांग्रेसी को भी कभी दी थी कि राहुल गाँधी के महाराष्ट्र प्रवेश पर उनकी दुर्गति की जाएगी| मगर तब कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने (2010) पुलिस लगाकर ठाकरे के सैनिकों को ठिकाने लगा दिया था| खाकी वर्दी दीखते ही ठाकरे और शिव सैनिकों को झुरझुरी हो जाती रही|

अब अगले सप्ताह उद्धव ठाकरे के सामने चुनौती आयेगी कि वे मुख्यमंत्री कार्य वान्द्रा के अपने दुमंजिले आवास “मातोश्री” से सम्पादित करेंगे, अथवा सरकारी कार्यालय मालाबार हिल्स स्थित “वर्षा” भवन से| उद्धव की कोशिश है कि पिता का घर ही राजसत्ता का केंद्र बना रहे| उसका महत्व और हनक बनी रहे| इसके लिए राकांपा और कांग्रेस वालों को मनाना पड़ेगा| फैसला करेंगे मुख्यमंत्री के ममेरे भाई के ससुर शरदचन्द्र गोविंदराव पवार| रिमोट उन्हीं के चंगुल में है|
(वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)