Opinion: मामला मामला प्रज्ञा ठाकुर का हो या असीमानंद का – गलत फंसाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं?

मतलब आम आदमी को झूठे आरोप से बरी होने में 24 साल लग गए और पुलिस वालों को 15 साल में ही दोषी मानने की गुंजाइश खत्म कर दी गई। दोनों ही व्यवस्था सरकार की है …

New Delhi, Dec 02: बड़े लोगों को गलत फंसाना हो या फंसाए जाने के बाद बड़े हो जाने वालों पर से मुकदमा वापस लिए जाने का मामला हो या किसी अन्य कारण से किसी को गलत फंसाने का आरोप लगाया जाए – यह मांग नहीं की जाती है कि फंसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। सांसद प्रज्ञा सिंह का भविष्य में निर्दोष साबित होना हो या इसरो जासूसी कांड में फंसाए गए वैज्ञानिक को मुआवजा दिया जाना या फिर भड़काऊ भाषण के मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ मामला वापस लिया जाना हो या टुकड़े-टुकड़े गैंग के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति के बिना केस दायर किए जाने जैसा कोई भी मामला जब भी सरकार हाथ में लेती है, दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात नहीं होती है। ऐसे कई मामलों से साबित होता है कि मामला सही होता है और गलत फंसाए जाने का आरोप बेबुनियाद है। या फिर अपराधियों को सरकारी संरक्षण प्राप्त है।

आइए, इसे समझने की कोशिश करें। प्रज्ञा सिंह के मामले में अगर भारतीय जनता पार्टी को पूरा यकीन है कि उन्हें गलत फंसाया गया है तो उनके खिलाफ मामला वापस ले लिया जाना चाहिए और जिन लोगों ने फंसाया है उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो सकता है और जैसी उम्मीद जताई जा रही है, वे अदालत से बरी हो जाएंगी तो क्या उसके बाद उनके खिलाफ मामला बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी? हो सकती है? मेरे ख्याल से नहीं। क्योंकि अदालत से बरी निर्दोष ही होता है, दोषियों को बाकायदा बरी कराया जाता है और वह घिसा-पिटा तरीका है। उसपर मैं अलग से लिख चुका हूं। बरी होने का मतलब यह नहीं होगा कि उन्हें फंसाया गया था। वैसे भी, निर्दोष साबित होने और दोष साबित नहीं होने में फर्क है।

इसलिए, प्रज्ञा सिंह या समझौता मामला में असीमानंद को निर्दोष प्रचारित करना साजिश है और इसी क्रम में यह नई खबर है कि समझौता ब्लास्ट में पहले किसी पाकिस्तानी को पकड़ा गया था, उसे छोड़ दिया गया और असीमानंद को बाद में फंसाया गया और चूंकि वे दोषी नहीं थे इसलिए बरी हो गए। मेरे एक मित्र ने रजत शर्मा द्वारा अपने चैनल पर पढ़ी जा रही इस आशय की खबर का एक वीडियो भेजा तो मैंने उसे बताया कि यह भाजपा की रणनीति है – अपने काम को सही साबित करो और पिछली सरकार के काम को गलत। हो सकता है कोई पाकिस्तानी पकड़ा ही नहीं गया हो या छोड़ ही दिया गया हो तो उसके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए? कैसे होगी जब मांग ही नहीं की जाएगी। समझौता मामले में किसी पाकिस्तानी को पकड़ कर छोड़े जाने की जानकारी तो मुझे नहीं थी पर असीमानंद को बरी किए जाने की खबर मुझे याद थी। मैंने संबंधित खबर की कटिंग उसे भेज दी।

इसके साथ ही पूछा कि क्या यह इतना सीधा मामला है। तुम्हे नहीं लगता कि इस तरह लोगों को फंसाने और छोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और यह भी कि इस तरह तो कानून का राज है ही नहीं। किसी को फंसा दो और किसी को बचा लो। मित्र को बचा लेने वाली बात में यकीन नहीं है पर फंसाया जाता है यह वह मान रहा है (पता नहीं सिर्फ भाजपाइयों को या धर्म विशेष के दूसरे लोगों को भी)। मुद्दा यह है कि अगर यह आरोप लगाया जा रहा है कि गलत फंसाया गया है तो यह मांग साथ-साथ क्यों नहीं की जा रही है कि फंसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। कहने की जरूरत नहीं है कि फंसाने वाला साबित कर देगा कि सही ‘फंसाया’ गया है। और मामला उलझ जाएगा इसलिए सरकारी सिर्फ काम की बात से मतलब रखती है।

मेरे मित्र ने इसपर तर्क दिया कि सरकारी अधिकारियों को यह सुरक्षा होती है और इसी कारण इसरो जासूसी के फर्जी मामले में वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजीनियर एस नंबी नारायण (जन्म 12 दिसंबर 1941) पर 1994 में जासूसी का झूठा आरोप लगाने वाले अफसरों पर कार्रवाई नहीं हुई। मैं इस मामले को जानता तो हूं पर फॉलो नहीं कर रहा था। लेकिन यह जानकार माथा ठनका कि कार्रवाई सरकारी सुरक्षा के कारण नहीं हुई और संजीव भट्ट 22 साल पुराने मामले में जेल में हैं – यह कैसे हो सकता है। जाहिर है, ऐसा कोई कानून नहीं होगा। मैंने इस मामले को चेक किया तो पता चला और जो नहीं जानते हैं उन्हें संक्षेप में बता दूं कि सीबीआई ने 1996 में एस नंबी नारायण के खिलाफ मामला खत्म कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 1998 में निर्दोष घोषित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 50 लाख रुपए का मुआवजा दिया और गिरफ्तारी में केरल पुलिस के अधिकारियों की भूमिका का पता लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई। 2019 में उन्हें पद्मभूषण भी दिया गया। इस तरह यह अदालत में दोषी नहीं साबित होने के मामले से अलग है और यह माना जा चुका है कि उन्हें गलत फंसाया गया था। साध्वी प्रज्ञा और असीमानंद तथा ऐसे जो अन्य मामले हैं सब में कानूनन ऐसा ही होना चाहिए था पर गलत प्रचार से लोगों को भ्रमित किया जा रहा है और मेरा मित्र भी भ्रमित है। हालांकि वह पार्टी समर्थक होने के कारण भी हो सकता है और अभी वह मुद्दा नहीं है।

मैंने यह जानने की कोशिश की केरल पुलिस के दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो सकती है तो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से यह समझ में आया कि केरल सरकार ने अपने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामला खत्म कर दिया है क्योंकि यह 15 साल से ज्यादा पुराना मामला है। मतलब आम आदमी को झूठे आरोप से बरी होने में 24 साल लग गए और पुलिस वालों को 15 साल में ही दोषी मानने की गुंजाइश खत्म कर दी गई। दोनों ही व्यवस्था सरकार की है एक आम आदमी के लिए एक सरकारी अधिकारी के लिए नेताओं के लिए नियम और अलग है। इन अधिकारियों में से एक को केरल का सूचना आयुक्त भी बना दिया गया था। पर वह अलग मामला है। साफ है कि इन अधिकारियों को सरकार का समर्थन था। सरकार ने बचा लिया। वैसे यह मामला बंद हो चुका है ऐसा नहीं लगता है।

अंग्रेजी में कहावत है, जस्टिस डीलेयड इज जस्टिस डीनायड यानी न्याय में देरी का मतलब है न्याय नहीं होना। न्याय का मतलब मुआवजा, ईनाम नहीं होता है, न्याय का मतलब है – अपराधी/दोषी को सजा होना। अधिकारों के दुरुपयोग से किसी को जानबूझकर परेशान करने के कई मामलों में अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना, न्याय नहीं होना है और इसका मुख्य कारण पीड़ित के निर्दोष साबित होने में लगने वाला समय है। ऐसे मामले होते रहते हैं जब किसी निर्दोष को भिन्न कारणों से झूठे मामलों में फंसा दिया जाता है और उसे निर्दोष साबित होने में वर्षों लग जाते हैं और तब फंसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। इस तरह, कोई किसी को फंसा दे, उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। आम आदमी के मामले में कानून का ऐसा उपयोग होता है। नेताओं के मामले में अलग व्यवस्था की जाती है। उसे सांसद बना दो गवाही ही नहीं होगी या ऐसा ही कुछ और।

(वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)