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विजय रुपाणी से सीएम की कुर्सी छीनी, अब गुजरात से भी दूर करने की तैयारी

कहा तो ये भी जाता है कि आनंदीबेन को राज्यपाल बनवाने में विजय रुपाणी की भी भूमिका थी, उन्हें लग रहा था कि आनंदीबेन के प्रदेश में सक्रिय रहने से उनकी मुश्किलें बढ सकती है।

New Delhi, Sep 14 : वैसे तो सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद विजय रुपाणी ने संगठन में काम करने की इच्छा जताई है, लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी होने की उम्मीद बहुत कम है, इस तरह के संकेत हैं कि उन्हें प्रदेश की राजनीति से दूर रखा जाएगा, इसका एक ही रास्ता है कि उन्हें राज्यपाल बना दिया जाए, आनंदीबेन पटेल को हटाकर जब विजय रुपाणी को सीएम बनाया गया था, तो आनंदीबेन ने भी संगठन में काम करने की इच्छा जताई थी, लेकिन उनकी भी इच्छा पूरी नहीं हुई थी।

स्थापित परंपरा
कहा तो ये भी जाता है कि आनंदीबेन को राज्यपाल बनवाने में विजय रुपाणी की भी भूमिका थी, उन्हें लग रहा था कि आनंदीबेन के प्रदेश में सक्रिय रहने से उनकी मुश्किलें बढ सकती है, वैसे राजनीति में इसे एक स्थापित परंपरा के रुप में देखा गया है, जब किसी सीएम को उसकी इच्छा के खिलाफ हटाया जाता है, तो वो अपने उत्तराधिकारी के लिये बहुत सहज नहीं रहता, गुजरात की संवेदनशीलता इसलिये भी बढ गई है कि वहां विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है, यही कोई 15-16 महीने का समय बचा है।

येदियुरप्पा जैसा दम-खम नहीं
विजय रुपाणी में बीएस येदियुरप्पा जैसा दम-खम नहीं दिखता, कि राज्यपाल बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दें, और कह दें कि उन्हें तो राज्य की सियासत में रहना है, केन्द्रीय नेतृत्व जिस डर से येदियुरप्पा को कर्नाटक से बाहर करना चाह रहा था, उसका डर सही साबित हो रहा है, सीएम पद से हटने के बाद येदियुरप्पा वहां अपनी यात्रा शुरु करने जा रहे हैं, इस तरह की यात्राओं के सियासी मायने किसी से छिपे नहीं होते।

हरियाणा के जाट नेता खुश
रुपाणी के इस्तीफे की जो वजहें राजनीतिक गलियारों में कही जा रही है, उनमें एक ये भी है कि वो जातिय समीकरण में फिट नहीं हो पा रहे थे, प्रदेश की राजनीति में पाटीदार का प्रभुत्व है, गैर पाटीदार विजय रुपाणी को 2016 में गुजरात का सीएम बनाया गया, तो इसे एक प्रयोग के तौर पर देखा गया था, 2017 में चुनाव में तो बीजेपी विजय रुपाणी के नेतृत्व में जैसे-तैसे करीबी मुकाबले में जीत गई, लेकिन 2022 चुनाव के लिये ये तय पाया गया, कि कोई जोखिम लेना ठीक नहीं है, पाटीदार नेतृत्व के साथ ही चुनाव मैदान में जाना चाहिये, ये तो रही गुजरात की बात, लेकिन इससे सबसे ज्यादा उत्साहित हरियाणा में बीजेपी के जाट नेता हैं। वजह ये है कि जाट प्रभुत्व वाले राज्य में गैर जाट को सीएम बनाकर बीजेपी लीडरशिप ने वहां भी प्रयोग किया था, दूसरे कार्यकाल में बीजेपी को वहां भी किसी तरह जोड़-तोड़ कर सरकार बनाने में कामयाबी मिल गई थी, किसान आंदोलन के चलते कई तरह के समीकरणों में बदलाव देखने को मिल रहा है, ऐसे में हरियाणा में बीजेपी के जाट नेताओं का उत्साह परवान चढ रहा है। उन्हें लगता है कि अगर किसी प्रदेश में परिवर्तन की कोई गुंजाइश बनीं, तो पार्टी राज्य की परंपरागत जाट राजनीति के साथ चलना पसंद करेगी, ऐसे में उनमें से किसी की किस्मत खुल सकता है।

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