Opinion- मुसलमान आखिर क्यों गरीब की लुगाई बनते जा रहे हैं, जिसे देखो वही फरमान सुना रहा है

सिख भी एक समय आतंकी की पहचान लिए हुए थे पर वह तो अपनी इस पहचान को धो-पोंछ बैठे । अपने काम , अपने व्यवहार से । मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे।

New Delhi, Apr 17 : भारत में बहुत सारे और भी अल्पसंख्यक समाज के लोग हैं। सिख , ईसाई , जैन , पारसी , बौद्ध , पारसी आदि। लेकिन न सिर्फ़ चुनाव में , बल्कि बाक़ी मामलों में विवादित मुस्लिम ही क्यों होते हैं। गंगा जमुनी तहजीब की बात भी मुसलमानों की मिजाजपुरसी में ही होती है। लेकिन यह गंगा जमुनी तहजीब कभी प्रगाढ़ क्यों नहीं हो पाती , यह एक बड़ा सवाल है। अब सभी धर्मों , जातियों के बीच शादी-विवाह सामान्य बात हो चली है । लेकिन ऐसा क्यों है कि अगर हिंदू-मुसलमान के बीच शादी होती है तो विवाद का विषय बन जाती है।

यहां तक कि मुसलमान और सिख के बीच भी शादी अमूमन विवाद का विषय बन जाती है। लेकिन बाक़ी अल्पसंख्यकों के साथ शादी सहित कोई और विवाद कभी नहीं होता। एक समय खालिस्तान के चक्कर में , हिंदू , सिख दंगों के चक्कर में बहुत गहरी खाई खुद गई थी , हिंदू-सिख के बीच । पर समय रहते सिखों ने खुद को संभाल लिया और देश की मुख्य धारा में शामिल हो चुके हैं। लेकिन तमाम कोशिश के बावजूद मुसलमान आज भी अपने को देश की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं बना पाया है । उस की पहली और आख़िरी पहचान मुसलमान की ही रह गई है। ग़रीब , मजलूम , आतंकी और वोट बैंक की ही रह गई है। पाकिस्तान जाने के ताने सुनने की रह गई है।

सिख भी एक समय आतंकी की पहचान लिए हुए थे पर वह तो अपनी इस पहचान को धो-पोंछ बैठे । अपने काम , अपने व्यवहार से । मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे। आर एस एस और भाजपा उन की यह राह रोक रही है , या वह खुद इस के बड़े कारण हैं। मुस्लिम समाज को इस बात पर बहुत गहराई से सोचना , समझना चाहिए। और खुद को बदल कर देश की मुख्य धारा में खुद को समाहित करना चाहिए। अपने गले से अल्पसंख्यक होने , वोट बैंक होने के पट्टा उठा कर बंगाल की खाड़ी में फेंक देना चाहिए।

मुसलमानों को सोचना चाहिए कि नवजोत सिंह सिद्धू जैसे लोग कभी पंजाब में बिहार के कटिहार जैसा भाषण देते हुए सिखों से यह अपील क्यों नहीं करते मिलते कि तुम यहां मेजारिटी में हो मोदी को सुलटा दो। कटिहार में मुसलमानों से ही क्यों कहते हैं सिद्धू जैसे लोग । देवबंद में ही मायावती क्यों कहती हैं कि मुसलमानों का वोट बंटना नहीं चाहिए। मुसलमान आखिर क्यों गरीब की लुगाई बन गया है कि जिसे देखो , वही उसे अपना फ़रमान सुना कर यूज एंड थ्रो करता जा रहा है । मुसलमान कब तक पोलिटिकली कमोडिटी बने रहेंगे , कब तक फ़ुटबाल बना कर खेले जाते रहेंगे , यह फ़ैसला तो मुस्लिम समाज को ही लेना और सोचना है ।

(वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)