भ्रष्टाचार दशकों से चुनाव का बड़ा मुद्दा

देश के विभिन्न चुनावों में भ्रष्टाचार के मुद्दे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कुछ दफा तो  भ्रष्टाचार चुनाव का निर्णायक मुद्दा भी बना।

New Delhi, Apr 17 : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बहस करने के लिए एक बार फिर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दी है। अब तो यह प्रधान मंत्री पर है कि वे राहुल गांधी की चुनौती को स्वीकार करते हैं या नहीं। या फिर राहुल गांधी किस तरह की बहस और किस मंच पर चाहते हैं ?परोक्ष या प्रत्यक्ष ? यह सब तो वही नेता जानें। पर बहस तो वैसे भी हो ही रही है।

उच्चत्तम स्तर पर भी और देश के तृणमूल स्तर पर भी। मीडिया और अदालतों में भी यदा- कदा बहस चलती रहती है। पर सबसे ऊपर तो जनता की अदालत है। अनेक मतदातागण तृणमूल स्तर पर भी अन्य मुद्दों के साथ-साथ भ्रष्टाचार पर भी चर्चा कर रहे हंै। स्मार्ट फोन के विस्तार के कारण लगभग हर तरह की सूचनाएं अधिकतर गांवों के स्तर तक भी उपलब्ध हैं। ‘सूचना में ताकत होती है।’ चैपालों से लेकर चाय खानों-काफी हाउसों तक विभिन्न मुद्दांे की भी गंभीर चर्चा है। बल्कि यूं कहिए तो 1967 के आम चुनाव से ही किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार की समस्या पर देश चर्चा करता रहा है।

देश के विभिन्न चुनावों में भ्रष्टाचार के मुद्दे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कुछ दफा तो  भ्रष्टाचार चुनाव का निर्णायक मुद्दा भी बना। इस बार भी काफी हद तक बन रहा है और रिजल्ट पर उसका भारी असर दिख सकता है। यह मुद्दा कैसे न बने ? आजादी के बाद के वर्षों में ही सरकारों में भ्रष्टाचार के लक्षण दिखने लगे थे। वैसा इस बात के बावजूद हुआ कि तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि कालाबाजारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए। वे जानते थे कि भ्रष्टाचार रहेगा तो गरीबी नहीं जाएगी। भले कई कारणों से उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष डी.संजीवैया को यह कहना पड़ा था कि ‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।’ गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘झोपडि़यों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’ 1965-66 आते आते बिहार सहित कुछ राज्यों में स्थानीय सरकारों के भ्रष्टाचार के खिलाफ लोग उद्वेलित होने लगे। 1967 में बिहार में तो चुनाव का मुख्य मुद्दा सरकारी भ्रष्टाचार ही बन गया था। सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने के कारण पटना के एक संपादक को जेल भी जाना पड़ा था।

मतदाताओं ने बिहार के सरकारी दल को चुनाव में हरा दिया। गैर कांग्रेसी सरकार भी बन गई।पश्चिम बंगाल सहित आठ अन्य राज्यों में भी कांग्रेस तब सत्ता से च्युत हो गई थी।
1969 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया। 22 साल की आजादी के बाद भी गरीबी नहीं हट रही थी तो उसका एक बड़ा कारण सरकारी भ्रष्टाचार भी बताया गया।
कांग्रेस के भीतर के ‘सिंडिकेट तत्वों’ के खिलाफ इंदिरा गांधी का अभियान जारी था।
1969 में कांग्रेस में विभाजन हो गया।दो कांग्रेस बनी। बोलचाल की भाषा में एक को सिंडिकेट कांग्रेस और दूसरे को नाम इंडिकेट कांग्रेस कहा गया।

इंडिकेट कांग्रेस यानी इंदिरा कांग्रेस ने जनता को बताया कि सिंडिकेट कांग्रेस के नेता यथास्थितिवादी है और पूंजीपतियों के करीबी हैं।वे भ्रष्टाचार के विरोधी नहीं हैं। इंडिकेट यानी इंदिरा कांग्रेस की राय यह थी कि इन पर कार्रवाई के बिना गरीबी हटाने में मदद नहीं मिलेगी।
नतीजतन इंदिरा सरकार ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। राजाओं -महाराजाओं के प्रिवी पर्स को समाप्त कर दिया।उनके विशेषाधिकार भी खत्म हो गए। इससे इंदिरा गांधी को छवि निखरी और मतदाताओं ने भारी बहुमत से उन्हें लोक सभा का चुनाव जितवा दिया।
पर 1974 आते -आते जब सरकारी भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग सकी तो बिहार के छात्रों-युवकों ने भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,महंगाई और कुशिक्षा के खिलाफ 18 मार्च 1974 को आंदोलन शुरू कर दिया।बाद में जय प्रकाश नारायण ने उस आंदोलन को नेतृत्व दिया । उससे वह देशव्यापी आंदोलन में बदल गया।आंदोलन का पहला मुद्दा भ्रष्टाचार ही था। 1977 में लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय हो गई। जनता पार्टी की सरकार केंद्र में बनी।पर कलही जनता नेताओं से ऊबकर जनता ने 1980 में दुबारा कांग्रेस को सत्ता सौंप दी।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधान मंत्री बने तो उनकी छवि ‘मिस्टर क्लीन’ की थी।क्योंकि कांग्रेस महा सचिव के रूप में उन्होंने तीन कांग्रेसी मुख्य मंत्रियों को पदच्युत करवाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। उन मुख्य मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। पर 1985 में राजीव गांधी ने ओडिशा के कालाहांडी में यह कह कर देश को चैंका दिया कि सरकार जो 100 पैसे भेजती है,उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं।बाकी बिचाौलिए खा जाते हैं। 1987 आते- आते राजीव सरकार पर बोफर्स सौदे सहित भ्रष्टाचार के कई आरोप लगने लगे। 1989 का लोक सभा चुनाव तो मुख्य रूप से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही लड़ा गया।कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।वीपी सिंह की सरकार तो मंडल -मंदिर विवाद की भेंट चढ़ गई।पर 1991 में कांग्रेस के नरसिंह राव के नेतृत्व में केंद्र में बनी सरकार पर आए दिन भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे।

1996 के लोक सभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। 1998 तक सरकारें घिसटती-सरकती हुई किसी तरह चली। 1998 में बनी अटल सरकार 2004 तक चली।पर वह न तो भ्रष्टाचार के मोर्चे पर कोई कारगर कार्रवाई कर सकी और न ही अपना गठबंधन बनाए रख सकी। नतीजतन 2004 में कांग्रेस को फिर मौका मिल गया। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।
पर इस सरकार पर आरोप लगा कि उसने भ्रष्टाचार के साथ दस साल तक सह जीवन बिताया।
2014 के लोक सभा चुनाव के मुख्यतः दो ही मुद्दे थे। मनमोहन सरकार पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप और कांग्रेस की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति। चुनाव रिजल्ट के बाद ए.के. एंटोनी कमेटी ने भी तुष्टिकरण को कांग्रेस की हार का एक कारण बताया। यानी नरेंद्र मोदी के सत्तासीन होने में खुद मोदी का जितना सकारात्मक योगदान नहीं था,उससे अधिक मन मोहन सरकार का नकारात्मक योगदान रहा, खासकर भ्रष्टाचारों के आरोपों को लेकर ।

अब मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल के कामकाज जनता की कसौटी पर हैं।उन पर उसे अपने वोट के सहारे निर्णय करना है। राजग का अधिकतर प्रतिपक्षी दलों पर मुख्य हमला प्रतिपक्षी नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को लेकर हैं। दूसरी ओर प्रतिपक्ष बदले की भावना से की गई कार्रवाई का आरोप मोदी सरकार पर लगा रहा है। राहुल गांधी राफेल सौदे को लेकर मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। अब देखना है कि मतदाताओं की नजर में किस पक्ष पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोप जनता के लिए ‘सहनीय’ हैं और किसके भ्रष्टाचार ‘असहनीय’ ? यह जनता है, सब जानती है ! 1967 के बाद लगभग सभी दलों को बारी -बारी से केंद्र और राज्यों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सत्ता संभालने का अवसर मिलता रहा। अपवादों को छोड़कर अधिकतर दलों और नेताओं पर भ्रष्टाचार के छोटे -बड़े आरोप लगते रहे। हर अगले चुनाव में अधिकतर मतदाताओं ने उन्हें ही चुना जिन पर भ्रष्टाचार के अपेक्षाकृत हल्के आरोप थे। हालांकि इस मामले में कुछ अपवाद देखे गए। पर सामान्यतया यही हुआ कि मतदाताओं ने अधिक भ्रष्टचार को नकारा और कम भ्रष्टाचार को मजबूरन स्वीकारा।

(वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)