महिलाओं के सामने दो ही रास्ते हैं- या तो वे डर-डर कर जीयें या दुर्गा बन दुष्कर्मियों का संहार खुद करें

जैसे मृत्यु के बाद श्राद्धकर्म का विधान है, वैसे ही यह सब भी एक खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं है। दुष्कर्म होते रहेंगे, समाज चिंता व्यक्त कर आगे बढ़ जायेगा।

New Delhi, Dec 03 : सांसद जया बच्चन ने ठीक ही कहा है कि दुष्कर्मियों को भीड़ के हवाले किया जाये और उनकी लिंचिंग होने दी जाये। जो स्थिति बन गई है, उसमें उनके बयान से असहमत होना मुश्किल है। उन्होंने उन करोड़ों नागरिकों की पीड़ा को व्यक्त किया है, जो दुष्कर्म की बेकाबू होती घटनाओं से आतंकित हैं। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ भी ऐसी घटनाएं होना यह बताता है कि एक सभ्य समाज के रुप में हम नाकाम हो रहे हैं।

लेकिन क्या लिंचिंग से दुष्कर्म बंद हो जायेंगे? जिन देशों में ऐसा कानून है, वहां भी दुष्कर्म बंद नहीं हुए हैं। निर्भया कांड के बाद भी देश ऐसे ही आहत हुआ था। ऐसी ही भावनाएं तब भी व्यक्त की गई थीं। कानून को सख्त किया गया था। निर्भया कोष बना था। नतीजा क्या हुआ? उसके गुनाहगार आज भी धरती का बोझ बढ़ा रहे हैं। ज्यादातर राज्यों में निर्भया फंड की राशि का उपयोग तक नहीं हो रहा।
आखिर ऐसे हालात क्यों बने? दुष्कर्मी की भी तो कोई मां होगी, कोई बहन होगी, पिता होगा ? अगर उन्होंने उसे बचपन से महिलाओं-बच्चियों के साथ व्यवहार के तरीके सिखाये होते तो हमें इस दुर्दिन से शायद नहीं गुजरना होता। समाज में जिस तेजी से नंगापन बढा है, इंटरनेट और फिल्मों के माध्यम से समाज को जिस तरह सेक्स के कुएं में ढकेला जा रहा है, खुद महिलाएं सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में प्रस्तुत हो रही हों, क्या यह उसी का बट वृक्ष नहीं है? कानून के साथ-साथ समाजशास्त्रीय विधि से भी इस पर विचार करने की जरूरत है।

सच यह है कि एक अभिभावक के तौर पर, एक समाज के तौर पर और एक संविधान शासित राज्य के रूप में हम नाकाम हो रहे हैं। फेल हो रहे हैं। देश जरूर आगे बढ़ रहा है, लेकिन सभ्य समाज के तौर पर हम पिछड़ते जा रहे हैं।
क्या यह सच नहीं है कि जिस संविधान और न्यायपालिका का हम यशोगान करते नहीं अघाते, उसी के तहत दुष्कर्म के आरोपी चुनाव जीत कर सांसद और विधायक बन जाते है ? दुष्कर्मी विधायक और सांसद पर कार्रवाई करने में पार्टियां लज्जा से लाल हो जाती हैं ? और नहीं तो उनके समर्थन में खड़ी हो जाती है? न्यायपालिका भी सजा देने में चूक जाती है? सजा मिलती भी है तो इतने वर्षों बाद कि उसकी महत्ता ही खत्म हो चुकी होती है।

क्या यह सच नहीं है कि हाल ही में न्यायपालिका के शिखर पुरुष पर छेड़छाड़ का आरोप लगता है और उसे आनन फानन में झूठा करार दे दिया जाता है ? जब यह स्थिति हो तो महिलाएं सुरक्षित कैसे होंगी ? संसद में गरमा गरम भाषण, सड़कों पर प्रदर्शन, कैंडिल मार्च होते रहेंगे। सरकारें महिला सुरक्षा का संकल्प व्यक्त करती रहेंगी। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट भी बनेंगे। लेकिन नतीजा शून्य…। जैसे मृत्यु के बाद श्राद्धकर्म का विधान है, वैसे ही यह सब भी एक खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं है। दुष्कर्म होते रहेंगे, समाज चिंता व्यक्त कर आगे बढ़ जायेगा।
महिलाओं के सामने दो ही रास्ते हैं-या तो वे डर डर कर जीयें या दुर्गा बन दुष्कर्मियों का संहार खुद करें।
देश के सामने रास्ता यह है कि अंग्रेजों से लिये गये कानून और न्यायपालिका को रद्द कर उसे नए सिरे से रचा जाये। क्या देश इसके लिए तैयार है?

(वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)